Sunday, 13 July 2025

खूबसूरत है वो इतना

 आज़ मकान की छत डल गयी है। खूब बरसात हुईं, बरसात के साथ अक्सर छते नही डलती है। लेकिन टाइमिंग इस तरह से हुईं कि बरसात चलती रही, बरसती रही और छत डलती रही।

इस वक्त मकान के बाहर बैठा हूं, बरसात नही है, मेंढ़क टर्रा रहे है। दो पैग बन कर अंदर उतर गये है। बोन फायर है, मै हूं और गाना चल रहा है : खूबसूरत है वो इतना सहा नही जाता। 

प्यार फरिश्तो से किया नही जाता। इस लकीर पर अटक गया मन। जों लोग सुपीरियर कॉम्प्लेक्स मे होते है। फरिश्ता टाइप, उनसे न तो प्यार हो सकता है, न उनसे कोई प्यार कर सकता है। सच्ची बात कह दी। लिखने वाले ने। 

मेनका ने बहुत मेहनत की आज़। थक भी गयी वो, मैंने कहा तू आराम कर ले अब, बहुत मेहनत की तूने आज़। उसके चेहरे को देख कर लगा उसकी थकान उतर गयी ऐसा सुनते ही। पत्नी को इतना ही चाहिये, कि पति उसे समझ ले रोजमर्रा मे। 

अच्छा दिन था आज़ का, मै निश्चिन्त था, कि सब हों जायेगा। मौसम विपरीत था। लेकिन मै अपना काम कर रहा था, बीच मे एक दो बार माँ से प्रार्थना भी की, कि काम बिगड़ने से बचा लेना प्रकृति! 

शाम को अहसास हुआ कि आसपास के इलाकों मे बाढ़ के हालात है, बूँदी मे, भीलवाड़ा मे। प्रार्थना सुन ली गयी है। 

अभी तीसरे पैक कि तैयारी है। 

अंदर शांति है। संतोष है। अश्वस्ति है। 

कलेक्टिव नेस कि फिलिंग है, जैसे टूटा हुआ जिस्म जुड़ रहा है। बिखरा हुआ अस्तित्व एकत्र हों रहा है। 

अब बस इतना ही लिखना ठीक है।